सारांश
कृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं और अपने भव्य और भयानक विश्वरूप को प्रकट करते हैं।
श्लोक 12
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥
divi sūrya-sahasrasya bhaved yugapad utthitā | yadi bhāḥ sadṛśī sā syād bhāsas tasya mahātmanaḥ ||
यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदय हों, तो उनका प्रकाश शायद उस परमपुरुष के इस विश्वरूप के तेज की समता कर सके।