सारांश
कृष्ण क्षेत्र (शरीर/पदार्थ) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/चेतना) के बीच अंतर करते हैं।
श्लोक 2
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥
idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetram ity abhidhīyate | etad yo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tad-vidaḥ ||
हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर क्षेत्र कहलाता है और जो इस शरीर को जानता है, उसे इस क्षेत्र का जानने वाला (क्षेत्रज्ञ) कहा जाता है।