सारांश
कृष्ण भौतिक अस्तित्व के रूपक वृक्ष का वर्णन करते हैं और खुद को सर्वोच्च दिव्य पुरुष के रूप में प्रकट करते हैं।
श्लोक 15
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
sarvasya cāhaṃ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṃ ca | vedaiś ca sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛd veda-vid eva cāham ||
मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है। मैं ही वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ। निस्संदेह मैं ही वेदान्त का संकलनकर्ता तथा समस्त वेदों का जानने वाला हूँ।