सारांश
कृष्ण श्रद्धा, भोजन, यज्ञ, तप और दान को प्रकृति के तीन गुणों में वर्गीकृत करते हैं।
श्लोक 3
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata | śraddhā-mayo ’yaṃ puruṣo yo yac-chraddhaḥ sa eva saḥ ||
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही होता है।