सारांश
कृष्ण शरीर और अमर आत्मा (आत्मन) के बीच अंतर समझाते हुए अपनी शिक्षाएं शुरू करते हैं। वह अर्जुन से बिना फल की आसक्ति के अपना कर्तव्य निभाने का आग्रह करते हैं।
सञ्जय उवाच । तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥
sañjaya uvāca | taṃ tathā kṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam | viṣīdantamidaṃ vākyamuvāca madhusūdanaḥ ||
संजय ने कहा: करुणा से व्याप्त, शोकयुक्त और आंसुओं से भरे नेत्रों वाले अर्जुन को देखकर मधुसूदन (कृष्ण) ने ये शब्द कहे।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣu kadācana | mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmani ||
तुम्हें अपना कर्तव्य करने का अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों पर नहीं। कभी भी अपने आप को अपने कार्यों के परिणामों का कारण मत मानो, और कभी भी कर्तव्य न करने में आसक्त मत होओ।