अध्याय सूची

कर्मयोग

कर्म योग

सारांश

कृष्ण बताते हैं कि हर किसी को किसी न किसी तरह की गतिविधि में शामिल होना चाहिए। वह कर्म योग, यानी परमात्मा को यज्ञ के रूप में किए गए निस्वार्थ कर्म का मार्ग बताते हैं।

श्लोक 21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ | sa yat pramāṇaṃ kurute lokas tad anuvartate ||

महापुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य व्यक्ति भी उसी का अनुसरण करते हैं। वह अपने अनुकरणीय कार्यों से जो आदर्श स्थापित करता है, समस्त विश्व उसका अनुसरण करता है।