अध्याय सूची

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

ज्ञान कर्म संन्यास योग

सारांश

कृष्ण इस प्राचीन योग के इतिहास, अपने दिव्य अवतरण (अवतार) की प्रकृति और पारलौकिक ज्ञान के मार्ग को प्रकट करते हैं।

श्लोक 7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata | abhyutthānam adharmasya tadātmānaṃ sṛjāmy aham ||

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।

श्लोक 8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām | dharma-saṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ||

साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की भलीभाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।