सारांश
कृष्ण मन को नियंत्रित करने और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए ध्यान (ध्यान योग) की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं।
श्लोक 5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
uddhared ātmanātmānaṃ nātmānam avasādayet | ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ ||
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन की सहायता से अपना उद्धार करे और अपने को नीचे न गिरने दे। यह मन बद्धजीव का मित्र भी है और शत्रु भी।