सारांश
कृष्ण अपनी पूर्ण प्रकृति को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ऊर्जाओं के स्रोत के रूप में प्रकट करते हैं।
श्लोक 7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
mattaḥ parataraṃ nānyat kiñcid asti dhanañjaya | mayi sarvam idaṃ protaṃ sūtre maṇi-gaṇā iva ||
हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है। जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है।