अध्याय सूची

ज्ञानविज्ञानयोग

ज्ञान विज्ञान योग

सारांश

कृष्ण अपनी पूर्ण प्रकृति को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ऊर्जाओं के स्रोत के रूप में प्रकट करते हैं।

श्लोक 7

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥

mattaḥ parataraṃ nānyat kiñcid asti dhanañjaya | mayi sarvam idaṃ protaṃ sūtre maṇi-gaṇā iva ||

हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है। जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है।