अध्याय सूची

अक्षरब्रह्मयोग

अक्षर ब्रह्म योग

सारांश

कृष्ण मृत्यु के समय अंतिम विचार के महत्व और सर्वोच्च गंतव्य प्राप्त करने के तरीके को समझाते हैं।

श्लोक 5

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥

anta-kāle ca mām eva smaran muktvā kalevaram | yaḥ prayāti sa mad-bhāvaṃ yāti nāsty atra saṃśayaḥ ||

जो व्यक्ति अंतकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह तुरंत मेरे भाव को प्राप्त होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।