सारांश
कृष्ण अपनी सर्वोच्च प्रकृति और शुद्ध भक्ति की शक्ति के बारे में सबसे गोपनीय ज्ञान प्रकट करते हैं।
श्लोक 22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
ananyāś cintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate | teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yoga-kṣemaṃ vahāmy aham ||
किंतु जो लोग अनन्य भाव से मेरे दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए निरंतर मेरी पूजा करते हैं, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके पास है, उसकी रक्षा करता हूँ।